बहुगुणा जी ने बंसी लाल से कहा इसीलिए हरियाणा से मुख्यमंत्री और इलाहाबाद से प्रधानमंत्री बनते हैं !
इम्तियाज़ खान--
पुण्यतिथि 17 मार्च
राज खन्ना
बहुगुणा जी ये आपने क्या करा दिया ? तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री बंसी लाल ने उत्तर प्रदेश के तकालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा पर यह तंज इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के लोकसभा से निर्वाचन को रद्द किए जाने के फैसले के बाद कसा था। बहुगुणा जी ने हाईकोर्ट में वकालत कर रहे अपने पुत्र विजय बहुगुणा को फैसले की प्रति लेकर दिल्ली पहुंचने को कहा था। बहुगुणा जी दिल्ली में अपने पुत्र के साथ इंदिरा गांधी से भेंट करने पहुंचे। उस समय बंसी लाल सहित वो पूरी मंडली मौजूद थी जो किसी भी हालत में प्रधानमंत्री पद से इंदिरा जी के इस्तीफे के खिलाफ थी। बहुगुणा जी की विरोधी लॉबी पहले से ही इंदिरा जी के कान भरने में लगी थी। हाईकोर्ट के फैसले ने रही -सही कसर और पूरी कर दी। बंसीलाल ने कहा , " हमारे हरियाणा में होता तो देखते इंदिरा जी कैसे हारतीं ? संयमित बहुगुणा जी का उत्तर मारक था , " इसीलिए इलाहाबाद से प्रधानमंत्री होते हैं और हरियाणा से मुख्यमंत्री। हम लोग न्याय प्रक्रिया में कभी हस्तक्षेप नहीं करतें। "
बहुगुणा उन नेताओं में थे जिन्होंने 1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन के मौके पर इंदिरा गांधी का सक्रिय साथ दिया था। 1971 में वे केंद्र में मंत्री बनाए गए। 8 नवंबर 1973 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पहली बार पद संभाला। 1974 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर कामयाब रही। बहुगुणा ने 5 मार्च 1974 को दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जाहिर है कि ये वह दौर था , जब उन्हें इंदिरा गांधी का पूरा भरोसा हासिल था। लेकिन अगले कुछ दिनों में पार्टी के भीतरी समीकरण बदलने लगे। संजय गांधी का उदय हो रहा था। बहुगुणा की प्रशासनिक कार्य में अनुचित दखलंदाजी बर्दाश्त न करने की आदत कांग्रेस के भीतर उनके विरोधियों की संख्या बढ़ा रही थी। संजय गांधी को भी उन्होंने नाराज कर दिया था। लखनऊ से दिल्ली तक उनकी विरोधी लॉबी सक्रिय थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद बहुगुणा उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने इंदिरा जी को इस्तीफा देने और कुछ दिनों के लिए कार्यभार अपने भरोसेमंद सरदार स्वर्ण सिंह को सौंपने की सलाह दी थी।
इंदिरा जी से उनकी दूरी की एक वजह 1974 का राज्यसभा का वो चुनाव भी बना जिसमें बहुगुणा के विरोध के चलते उद्योगपति के.के. बिड़ला पराजित हो गए। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के आठ सदस्यों के निर्वाचन के लिए विधायकों के पर्याप्त वोट थे। कुछ अतिरिक्त वोट भी थे। इंदिरा जी और संजय गांधी की सहमति से उद्योगपति के.के. बिड़ला ने नौंवें उम्मीदवार के तौर पर नामांकन कर दिया। इंदिरा जी के प्रतिनिधि यशपाल कपूर ने बिरला के पक्ष में अतिरिक्त वोट जुटाने के लिए लखनऊ के राज्य अतिथिगृह में डेरा डाल दिया। अप्रसन्न बहुगुणा ने इंदिरा जी से अनुरोध किया कि यदि वे बिड़ला की जीत पक्की करना चाहती हैं तो उन्हें पार्टी के आठ उम्मीदवारों की सूची में शामिल कर लें। इंदिरा जी का उत्तर नकरात्मक था। उधर यशपाल कपूर की वोटों की खरीद - फरोख्त जारी थी। बहुगुणा ने उनसे सरकारी अतिथि गृह खाली करने के लिए कहा। कपूर ने इसकी उपेक्षा की। बहुगुणा ने उनका सामान अतिथि गृह से बाहर कराकर संदेश दिया कि वे प्रदेश में किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे।
बहुगुणा ने इस चुनाव में बिड़ला का खुला विरोध किया। उन्होंने सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष से भी उन्हें हराने की अपील की। बहुगुणा ने खुला मतदान कराया। इस संबंध में यशपाल कपूर की आपत्ति निरस्त कर दी गई। बिड़ला चुनाव में पराजित हो गए। के.के. बिड़ला ने अपनी आत्मकथा में इस चुनाव की चर्चा करते हुए लिखा है, " संजय का सुझाव था कि मैं उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ूं। उसने इंदिरा जी से बात की और उन्होंने वायदा किया कि उनकी पार्टी की सहानुभूति मेरे साथ रहेगी। उन्होंने यशपाल कपूर को लखनऊ भेजा। मेरी जीत सुनिश्चित थी, क्योंकि चंद्रभानु गुप्त और विपक्ष का भी समर्थन मुझे प्राप्त था। किंतु एक बात मेरे ध्यान में नहीं आई , वह थी हेमवती नंदन बहुगुणा का विरोध। मैं उन्हें 1960 से जानता था। उनसे अधिक चालक राजनीतिज्ञ मुझे कभी नहीं मिला। वे मेरे घोर विरोधी थे।"
हार के बाद बिड़ला दिल्ली में संजय गांधी और इंदिरा जी से दिल्ली में मिले। कहा," यदि मुख्यमंत्री को दल के नेता के साथ विश्वासघात करना था तो मुझे चुनाव में खड़े होने के लिए प्रस्तावित करने का क्या तुक था !" संजय ने उन्हें तसल्ली दी। कहा कि उनकी मां ने बहुगुणा पर विश्वास किया लेकिन उन्होंने धोखा दिया। संजय काफी क्रोधित थे। इंदिरा जी भी बहुगुणा से अप्रसन्न थीं। वे बोलीं कि उन्होंने न केवल आपके साथ शरारत की है वरन मुझे भी धोखा दिया है। संजय ने जिद ठान ली। संजय और इंदिरा जी ने इस धोखे के लिए बहुगुणा को कभी क्षमा नहीं किया। बेपरवाह बहुगुणा ने किसी सफाई की जरूरत नहीं समझी।
असलियत में उस दौरान बहुगुणा का हर कदम उन्हें इंदिरा - संजय से दूर कर रहा था। इंदिरा जी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली के जिलाधिकारी का बहुगुणा ने ट्रांसफर कर दिया। संजय गांधी ने ट्रांसफर रोकने को कहा। बहुगुणा ने यह कहते हुए इनकार किया कि इसका दूसरों पर गलत संदेश जाएगा। बहुगुणा किसी संविधानेतर सत्ता को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। एक तरफ़ संजय गांधी लगातार प्रभावी हो रहे थे और केंद्र से लेकर राज्यों तक की कांग्रेसी सरकारें उनके सामने दंडवत थीं, तो दूसरी तरफ़ बहुगुणा उनकी अनदेखी कर रहे थे। संजय गांधी उनसे बेहद नाराज थे। धीरे -धीरे यह इंदिरा जी की नाराजगी बन गई।
बहुगुणा यहीं नहीं थमे। नेतृत्व की इच्छा के विपरीत रास्ते पर वे लगातार आगे बढ़ रहे थे। जेपी का सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन उफान पर था। गुजरात, बिहार से गुजरता ये आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में विस्तार पा रहा था। सिर्फ राज्य की कांग्रेसी सरकारें ही नहीं ,केंद्र की सरकार भी निशाने पर थी। जेपी और इंदिरा जी का सीधा टकराव था। उधर उत्तर प्रदेश पहुंचे जेपी को मुख्यमंत्री बहुगुणा ने राज्य अतिथि का दर्जा देकर राजभवन में टिकाया। समर्थकों की राय में स्वतंत्रता संघर्ष के अग्रणी नायक जेपी के प्रति बहुगुणा के मन में बहुत श्रद्धा थी। इसका एक दूसरा पहलू यह था कि वे जेपी को नरम रखकर उत्तर प्रदेश में उनके आंदोलन की तीव्रता रोकना चाहते थे। बहुगुणा का मकसद जो भी रहा हो। मुख्यमंत्री के तौर पर उनके ऐसे फैसलों ने उनकी विदाई तय कर दी। 29 नवंबर 1975 को उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा हो गया।
(टीवी 9 भारतवर्ष में प्रकाशित : लिंक कमेंट बॉक्स में)
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