2 अक्तूबर जन्मदिन:: गांधी ने जज से कहा, जानता हूं कि मैं आग से खेल रहा पर मैं दया नही चाहता


इम्तियाज खान

राज खन्ना
                 साबरमती आश्रम में गाँधीजी की शाम की प्रार्थना अभी समाप्त ही हुई थी। तभी पुलिस आयी। गाँधीजी ने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत कर दिया। उन पर अख़बार 'यंग इण्डिया' के 29 सितम्बर 1921, 15 दिसम्बर 1921 और 23 फरवरी 1922 के अंकों में ऐसे तीन लेख लिखने का आरोप था, जिनका मकसद ब्रिटिश भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध असंतोष, उत्तेजना और विद्रोह के लिए लोगों को भड़काना था। इन लेखों के शीर्षक थे ," वफ़ादारी के साथ छेड़छाड़" , " पहेली और इसके समाधान " तथा " प्रेतों को हिलाना "। गांधी जी के साथ ही अख़बार के प्रकाशक शंकर भाई धेला भाई बैंकर भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124 ए के तहत मुल्जिम बनाये गए।

        10 मार्च को गांधी जी गिरफ्तार हुए और  18 मार्च 1922 को अहमदाबाद के डिस्ट्रिक्ट सेशन जज सी.एन. ब्रुम्सफील्ड की अदालत में  मुकदमा शुरु हुआ। बम्बई के एडवोकेट जनरल जे.टी.स्ट्रांगमैन ने अभियोजन पक्ष की अगुवाई की।स्ट्रांगमैन ने कहा कि जिन तीन लेखों के आधार पर यह मुकदमा चलाया जा रहा है, उन पर अलग-अलग विचार नही किया जा सकता, क्योंकि पिछले दो वर्षों से  सरकार उलटने के लिए जो प्रचार किया जा रहा हूं, ये लेख उसके अंशमात्र हैं। स्ट्रांगमैन ने गाँधीजी के कुछ और भी लेखों के अंश सुनाए। उन्होंने गाँधीजी की खूबियों का जिक्र किया लेकिन जोड़ा," इस तरह के लेख भयंकर उथल-पुथल मचा सकते हैं। बम्बई और चौरी चौरा की क्रूरतापूर्ण घटनाएं, उत्तेजना-नफ़रत फैलाने वाली ऐसी ही  कोशिशों की देन हैं।" गाँधीजी पर सीधा आरोप लगाते हुए स्ट्रांगमैन ने कहा कि  गांधी अहिंसा का प्रचार जरूर करते हैं लेकिन उसी के साथ लोगों के मन में असन्तोष भी भड़काते हैं। जो उपद्रव हुए हैं, उसके लिए वही जिम्मेदार हैं।

          गाँधीजी ने कुछ कहने की जज से अनुमति मांगी। इस मौके पर उनका बयान उनकी साफगोई और अदम्य साहस का परिचायक है। बीच में एक सदी का फासला है। फिर भी उसे जब - तब दोहराया जाता है। गाँधीजी ने कहा," मैं एडवोकेट जनरल से सहमत हूँ। हाँ, सब कुछ की मेरी जिम्मेदारी है। अभियोग में जितना कहा गया है, उससे और भी  बहुत अधिक दिनों से मैं जनता में असंतोष का प्रचार कर रहा हूँ। मद्रास की दुर्घटना अथवा चौरी चौरा की पाशविक नृशंसता या बम्बई की हिंसा, इनका दोष मैं स्वयं पर लेता हूँ। एडवोकेट जनरल ने ठीक कहा है कि सुशिक्षित, जिम्मेदारी को समझनेवाला और अनेक देशों की जानकारी के कारण मुझे पहले से ही यह ज्ञात होना चाहिए था कि मेरे प्रत्येक कार्य का क्या परिणाम हो सकता है ? 
          मैं जानता हूँ कि मैं आग से खेल रहा हूँ, फिर भी मैंने यह खतरा लिया और अगर मैं छोड़ दिया गया तो फिर यही कार्य करूँगा। अभी मैं जो कह रहा हूँ , वह न कहूँ तो अपने प्रति अन्याय करूँगा। आज सवेरे मेरे मन में यही बात उठ रही थी। मैने हिंसा को टालना चाहा था, आज भी टालना चाहता हूँ। अहिंसा मेरे विश्वास और नीति की आख़िरी शर्त है। लेकिन मुझे किसी न किसी का चुनाव करना पड़ा। जिस व्यवस्था ने मेरे देश की  अपूरणीय क्षति की है, ऐसा मैं मानता हूँ या तो उसे सिर झुका कर मान लूँ , नही तो उन्मत्त जनता की जिम्मेदारी लेने को तैयार रहूँ। जनता जब मेरी बातों की सच्चाई समझेगी तो उन्मत्त होगी ही। मैं जानता हूँ कि कभी कभी मेरे देशवासी उन्मत्त हुए हैं। उसके लिए मैं दुखी हूँ और इसी कारण आज मैं यहाँ आया हूँ। मामूली सजा के लिए नही। कठोर से कठोर सजा के हाथों अपने को सौंपने के लिए। मैं दया नही चाहता। यह  प्रार्थना भी नही करता कि मुझे हल्की सजा दी जाए। कानून की नज़र में जो जान- बूझकर किया गया अपराध है, लेकिन मेरी नज़र में किसी नागरिक का इससे बड़ा दूसरा कर्तव्य नही है। इसी से आज मैं हँसते-हँसते उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा पाने के लिए यहाँ आया हूँ। अतएव जज महोदय, आप जो कर सकते हैं, वह यह कि या तो आप इस्तीफ़ा दे दें या फिर मुझे कड़ी से कड़ी सजा दें।"

          गांधी जी का  बयान और मुकदमे के दौरान जज ब्रुम्सफील्ड और गाँधीजी के मध्य हुआ संवाद देश के अदालती इतिहास की एक धरोहर है। एक अभियुक्त जिसने अपराध स्वीकार कर लिया हो, उस अभियुक्त के प्रति जज का आदरभाव और फिर भावनाओं और कर्तव्यबोध के बीच जज की कशमकश का यह केस नजीर बना। जज ने कहा," मिस्टर गांधी आपने अपना अपराध स्वीकार करके एक ओर मेरा काम आसान कर दिया लेकिन कौन सा दण्ड उचित होगा, इसका निर्णय करना ही न्यायाधीश के लिए हमेशा सबसे कठिन काम होता है। यह सम्भव नही है कि इस बात से आंखें मूंद ली जाएं कि आप लाखों लोगों की दृष्टि में एक महान नेता और महान देशभक्त हैं। यहाँ तक कि जो लोग राजनीति में आपसे सहमत नही हैं, वे भी आपको उच्च स्तर का आदर्शवादी मानते हैं। आपका जीवन महिमा- मंडित है। एक साधु के समान पवित्र भी है। लेकिन मेरा कर्तव्य है कि कानून के अन्तर्गत एक प्रजा के रूप में आप पर विचार करूँ। आप ऐसा काम कर रहे हैं, जिससे किसी भी सरकार के लिए सम्भव नही है कि वह आपको स्वतन्त्र रहने दे और शायद भारत में कम ही ऐसे लोग होंगे जिन्हें यह जानकारी मिलने पर दुख नही होगा। लेकिन जब यही सत्य है तो और किया ही क्या जा सकता है। आपको क्या दंड दिया जाए और राष्ट्रीय हित में  कितना दण्ड दिए बिना काम नही चलेगा, मैं इन दोनों की तुलना करके देखने की चेष्टा कर रहा हू
         
      अदालती कार्यवाही का यह दिलचस्प दृश्य था। जज ने सम्मानपूर्वक दोषसिद्ध गांधीजी से सजा की मात्रा पर उनका सुझाव मांगा। जज ने फिर प्रस्ताव किया," बारह साल पहले ऐसे ही मामले में तिलक को छह साल की सजा दी गई थी। क्या यह सजा आपको अनुचित लगती है ?  बाद में यह कम हो सकी तो मुझसे अधिक प्रसन्नता किसी को न होगी।" सजा से बेफ़िक्र गाँधीजी हमेशा की तरह विनम्र थे। उनका उत्तर था ," तिलक के साथ आपने मेरा नाम जोड़ा , इससे मुझे गर्व का अनुभव हो रहा है। कोई भी न्यायाधीश इससे कम सजा नही दे सकते थे। मुकदमे की कार्यवाही के प्रत्येक क्षण मेरे साथ जिस सम्मान का व्यवहार किया गया, उसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ।" 

   जज ब्रुम्सफील्ड ने गांधी जी केवल एक साल की जुर्माने सहित सजा सुनाई। सजा भुगतने के लिए जेल ले जाये जाते गांधी के पीछे लोगों का बड़ा हुजूम था। तमाम भावुक और उदास थे। गाँधीजी हँसते हुए साबरमती जेल में दाखिल हुए। बाहर खड़ी बा लोगों से शांति के साथ गाँधीजी के बताए रास्ते पर आगे बढ़ने का अनुरोध कर रहीं थीं।

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