मोहम्मद ज़ुबैर को सुप्रीम कोर्ट ने आज शाम छह बजे तक रिहा करने का दिया आदेश

रिपोर्ट-इम्तियाज़ खान
श्रोत-BBC
ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में दर्ज सभी छह मामलों में अंतरिम ज़मानत दे दी है.

जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने मोहम्मद ज़ुबैर को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यह अच्छा होगा कि सभी एफ़आईआर को एक साथ लाकर एक एजेंसी से जाँच कराई जाए.

अगर बाद में और एफ़आईआर दर्ज होती है तो उनकी जाँच भी साथ में ही होगी. कोर्ट ने तिहाड़ जेल के अधीक्षक को आज शाम छह बजे तक मोहम्मद ज़ुबैर को रिहा करने का आदेश दिया है.

सुनवाई के दौरान जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, ''उन्हें दिल्ली वाले मामले में गिरफ़्तार किया गया, जिसमें ज़मानत मिल गई है. उत्तर प्रदेश के सीतापुर एफ़आईआर में हमने बेल मंज़ूर कर दी है.''

यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि मोहम्मद ज़ुबैर से कहा जाए वो ट्वीट ना करें. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक पत्रकार को लिखने से कैसे रोका जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी क़ानून का उल्लंघन होता है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवाज़ उठाने के लिए किसी के ख़िलाफ़ अग्रिम कार्रवाई कैसे की जा सकती है?

उत्तर प्रदेश में दर्ज अन्य मामलों के बारे में मोहम्मद ज़ुबैर की वकील वृंदा ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, ''हाथरस में दर्ज मामले में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया है. वहीं लखीमपुर खीरी केस में पुलिस रिमांड के आवेदन पर आज सुनवाई होगी.''

एडवोकेट ग्रोवर ने आगे कहा, ''कृपया, इनके ट्वीट देखिए. इसमें उकसाने वाला कुछ भी नहीं है.''

उन्होंने सुदर्शन टीवी की ओर से दर्ज कराए गए मामले का भी ज़िक्र किया. उन्होंने बताया, ''बतौर फ़ैक्ट चेकर उन्होंने सुदर्शन टीवी के एक ग्राफ़िक्स में ग़लत मस्जिद की तस्वीर दिखाने के मामले को उठाया. बतौर फ़ैक्ट चेकर गज़ा बम धमाके में उन्होंने असल मस्जिद की तस्वीरें पेश की.''

वृंदा ग्रोवर के अनुसार, ''इस मामले को देखने से साफ़ है कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया, लेकिन सुदर्शन चैनल ने उन पर 153ए, 295ए के तहत केस दर्ज करा दिया. यह तो उन्हें चुप कराने की कोशिश है. पुलिस को टैग करते हुए कहा है कि उम्मीद है कि वे एक्शन लेंगे. असल में उकसा कौन रहा है?''

पिछले 20 जून को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने मोहम्मद ज़ुबैर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की थी. उन पर यह एफ़आईआर 2018 में सेंट्रल बोर्ड फ़िल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफ़सी) से हरी झंडी मिली 1983 की फ़िल्म 'किसी से ना कहना' की एक तस्वीर पोस्ट करने के मामले में हुई थी.

इसमें दिखाया गया है कि हनीमून होटल का नाम बदलकर हनुमान होटल कर दिया गया है. इस तस्वीर को लेकर ही हनुमान भक्त' नाम के एक ट्विटर यूज़र ने शिकायत की थी और कहा था कि उसकी धार्मिक भावना आहत हुई है.

ज़ुबैर ने इसी तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा था, ''2014 से पहले हनीमून होटल, 2014 के बाद हनुमान होटल. 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे. कहा जा रहा है कि मोहम्मद ज़ुबैर ने इस तस्वीर को ज़रिए पीएम मोदी पर तंज़ किया था.

मोहम्मद ज़ुबैर की वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में सवाल उठाते हुए कहा था कि पुलिस कैसे जादुई तरीक़े से इस ख़ास ट्वीट के आधार पर मोहम्मद ज़ुबैर के चार साल पुराने ट्वीट के लिए गिरफ़्तार कर सकती है.

इस मामले में ज़ुबैर को पहले ही ज़मानत मिल गई थी

बाद में उत्तर प्रदेश में मोहम्मद ज़ुबैर के ख़िलाफ़ छह एफ़आईआर दर्ज किए गए थे. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इन छह मामलों में भी अंतरिम ज़मानत दे दी.

इससे पहले बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की प़ैग़ंबर मोहम्मद पर विवादित टिप्पणी के कारण भारत को राजनयिक स्तर पर निपटना पड़ा था.

कई इस्लामिक देशों ने भारत को लेकर बयान जारी किया था और कड़ी कार्रवाई की मांग की थी. क़तर ने तो भारत से माफ़ी की मांग की थी. बाद में भारतीय जनता पार्टी ने नूपुर शर्मा को पार्टी से निलंबित कर दिया था.

दरअसल, नूपुर शर्मा के मामले को मोहम्मद ज़ुबैर ने ही ज़ोर-शोर से उठाया था. बाद में यह मामला सरहद पार कर इस्लामिक देशों में भी मुद्दा बन गया था और फिर एक-एक कर इस्लामिक देशों ने भारत के ख़िलाफ़ बयान जारी किया था. बाद में मोहम्मद ज़ुबैर को भी धार्मिक भावना आहत करने के मामले में गिरफ़्तार किया गया.

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